सिमस्थ कुंभ महापर्व उज्जैन 2016 – पवित्र स्नान की तिथियाँ

  • शाही स्नान (रॉयल पवित्र स्नान)

    चैत्र शुक्ल पक्ष 15, 22 अप्रैल, 2016 (शुक्रवार)

  • पंचेशानी यात्रा प्रारंभ

    वैशाख कृष्ण पक्ष 9, 1 मई, 2016 (रविवार)

    वैशाख कृष्ण पक्ष 30, 6 मई, 2016 के लिए (शुक्रवार)

  • व्रतपर्व वरूथिनी एकादशी

    वैशाख कृष्ण पक्ष 11, 3 मई, 2016 (मंगलवार)

  • वैशाख कृष्ण अमावस्या

    वैशाख कृष्ण पक्ष 30, 6 मई, 2016 (शुक्रवार)

  • अक्षय तृतीया

    वैशाख शुक्ल पक्ष 3, 09 मई, 2016 (सोमवार)

  • शंकराचार्य जयंती

    वैशाख शुक्ल पक्ष 5, 11 मई, 2016 (बुधवार)

  • वृषभ संक्रांति

    वैशाख शुक्ल पक्ष 9 15 मई, 2016 (रविवार)

  • शाही स्नान (रॉयल पवित्र स्नान)

    चैत्र शुक्ल पक्ष 15, 22 अप्रैल, 2016 (शुक्रवार)

  • मोहिनी एकादशी

    वैशाख शुक्ल पक्ष 11, 17 मई, 2016 (मंगलवार)

  • प्रदोष

    वैशाख शुक्ल पक्ष 13, 19 मई, 2016 (गुरुवार)

  • नृसिंह जयंती

    वैशाख शुक्ल पक्ष 14, 20 मई, 2016 (शुक्रवार)

  • प्रमुख शाही स्नान

    वैशाख शुक्ल पक्ष 15, 21 मई, 2016 (शनिवार)

सिंहस्थ कुंभ महापर्व के पवित्र स्नान का महत्व

क्षिप्रा नदी में अन्य स्थानों पर भी पवित्र डुबकियां लगायी जा सकती हैं किन्तु सिंहस्थ कुम्भ महापर्व के दौरान उज्जैन मे स्नान का स्वयं में ही एक विशेष महत्त्व है।

किंवदंती है की देव और दानवों द्वारा सागर मंथन के समय १४ रत्न-मणियों का अनाश्रय हुआ था :

श्री , रम्भा , विष , वारुनी , अमिया , शंख , गजराज ,

धन्वन्तरी , धनु , धेनु , तरु , चंद्रमारू , मणि , बजी ।

मंथन के दौरान अमृत से भरे कलश की भी उत्पत्ति हुई थी।

देव इस अमृत को दानवो के साथ साझा करने के हित में नहीं थे। देवराज इंद्र के कहने पर उनके पुत्र जयंता उस कलश को ले कर पलायन करने लगे जब दैत्य भी उनके पीछे हो लिए।

अमृत पर अधिकार पाने का संघर्ष स्वर्ग में देव और दानवों के बीच १२ दिन तक चला जिसके दौरान अमृत की कुछ बूँदें हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन की धरती पर गिरी और वहां की पवित्र नदियों मे समाहित हो गयी।

सिंहस्थ कुम्भ महापर्व क्षिप्रा नदी के पवित्र जल में अमृत की बूंद के उपलक्ष्य की स्मृति में मनाया जाता है। अन्य तीन स्थानों पर यह महोत्सव कुम्भ के नाम से अधिक लोकप्रिय है।

चूंकि अमृत कलश की प्राप्ति का संघर्ष स्वर्ग में १२ दिवस तक चलता रहा, यह काल चक्र पृथ्वी पर १२ वर्षों के समान हो गया; अतः कुम्भ महोत्सव १२ वर्षो में एक बार आता है।

धार्मिक महत्त्व के अलावा इस पर्व का सामाजिक महत्त्व भी है। इस त्यौहार को 12 साल मे एक बार होनेवाले विशाल सार्वजनिक जमावड़े के रूप में वर्णित किया जा सकता है जिसमे साधू - संत और धार्मिक प्रधान एक साथ आते है।

सिंहस्थ कुम्भ महापर्व मे सामान्य जन - जीवन को साधुओं की संगती में शांति की अनुभूति होती है।

चारो कुम्भ मे से उज्जैन कुम्भ को सिंहस्थ कुम्भ महापर्व कहा जाता है। सिंहस्थ कुम्भ महापर्व अपने अनेक अद्वितीय विशेषताओं के लिए काफी चर्चित है। पुरानो के आधार पर कुरुषेत्र को प्रयाग से १० गुना अधिक पवित्र माना गया है , कशी को प्रयाग से १० गुना अधिक पवित्र माना गया है, कशी और कुशस्थली से गया को १० गुना पवित्र कहा जाता है और उज्जैन गया से भी १० गुना अधिक पवित्र है। क्षिप्रा नदी की उपस्थिति उज्जैन के महत्त्व पर द्विगुण प्रकाश डालती है।